फिर शुरू हुआ पोषण माह, क्या नारों से जीत पाएंगे कुपोषण के विरुद्ध जारी युद्ध

पूर्वा टाइम्स – समाचार

सोनभद्र। जिले में बुधवार से 9वां राष्ट्रीय पोषण माह शुरू हो गया। 9 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक चलने वाले इस अभियान की थीम ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी’ रखी गई है। आंगनवाड़ी केंद्रों पर जागरूकता कार्यक्रम, पोषण संबंधी गतिविधियां और मातृ एवं बाल स्वास्थ्य को लेकर तमाम आयोजन होंगे। अधिकारियों के निर्देश भी जारी हो गए हैं लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा है कि हर साल पोषण माह मनाने के बावजूद क्या जिले के कुपोषित बच्चों तक पोषण और इलाज की व्यवस्था वास्तव में पहुंच पा रही है?

राष्ट्रीय पोषण माह के दौरान आहार विविधता, पर्याप्त प्रोटीन, ताजा पका भोजन, बाल विकास, मातृ स्वास्थ्य और सामुदायिक सहभागिता जैसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाने का दावा किया जा रहा है। प्रशासन इसे जनआंदोलन का स्वरूप देने की बात कर रहा है। मगर दूसरी ओर जिला स्वास्थ्य एवं शासी निकाय की बैठकों में कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र तक नहीं पहुंचाए जाने को लेकर अधिकारियों को फटकार लगना व्यवस्था की जमीनी तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जागरूकता के कार्यक्रम हर साल, फिर क्यों नहीं लग रही कुपोषण पर लगाम –

पोषण माह कोई नया अभियान नहीं है। हर वर्ष आंगनवाड़ी केंद्रों पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं, बच्चों और माताओं को पोषण का पाठ पढ़ाया जाता है और कुपोषण के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया जाता है। बावजूद इसके यदि कुपोषित बच्चों को समय पर चिन्हित कर NRC तक पहुंचाने की व्यवस्था में ही कमी सामने आती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि कागजों पर चल रही गतिविधियों और जमीन पर जरूरतमंद बच्चे तक पहुंच रही मदद के बीच इतना बड़ा फासला क्यों है? एक तरफ अभियान के तहत ‘सामुदायिक स्वामित्व और जवाबदेही’ की बात कही जा रही है, दूसरी तरफ बैठकों में कुपोषित बच्चों को NRC तक नहीं पहुंचाने पर अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना पड़ रहा है। ऐसे में पोषण माह की सफलता केवल कार्यक्रमों की संख्या और जागरूकता गतिविधियों के आंकड़ों से नहीं, बल्कि कुपोषित बच्चों की वास्तविक स्थिति में सुधार से तय होनी चाहिए।

नारे से नहीं, नतीजों से तय होगी सफलता –

‘हमारी आंगनबाड़ी, हमारी जिम्मेदारी’ का संदेश तभी सार्थक होगा, जब जिम्मेदारी केवल कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित न रहकर हर चिन्हित कुपोषित बच्चे तक स्वास्थ्य सेवा और पोषण पुनर्वास पहुंचाने की जवाबदेही में बदले। पोषण माह के दौरान फोटो, गोष्ठियां और जागरूकता कार्यक्रम अपनी जगह हैं, लेकिन गांवों में कुपोषित बच्चों की पहचान, नियमित निगरानी, परिवारों की काउंसलिंग और जरूरतमंद बच्चों को NRC तक पहुंचाने की व्यवस्था ही अभियान की असली कसौटी होगी।

बहरहाल पोषण माह की सफलता अब आयोजनों, नारों और आंकड़ों से नहीं, बल्कि कुपोषित बच्चों तक पहुंचने वाली वास्तविक मदद से तय होगी। यदि चिन्हित बच्चों को समय पर NRC तक पहुंचाने में ही तंत्र बार-बार सवालों के घेरे में आता रहा, तो ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी जिम्मेदारी’ का संदेश अधूरा ही माना जाएगा।

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