आत्मा तत्व का अद्वैत से संवाद होता हैःसाहित्य साधना मंच का ऑनलाइन काव्य आयोजन संपन्न

गोरखपुर/वाराणसी। विश्व शाँति मिशन से संबद्ध साहित्य साधना काशी मंच के तत्वावधान में  गूगल मीट के माध्यम से एक भव्य ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “पावस ऋतु/स्वैच्छिक” रखा गया,जिसके अंतर्गत कवियों ने वर्षा ऋतु,प्रकृति,भक्ति,श्रृंगार, लोकजीवन तथा समसामयिक विषयों पर अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का भावपूर्ण पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन रतलाम के सतीश शिकारी एवं गोरखपुर की प्रेमलता रसबिन्दु ने अत्यंत प्रभावशाली एवं सहज शैली में किया। कार्यक्रम के समापन पर गोरखपुर से अध्यक्ष अरुण कुमार श्रीवास्तव ‘शम्स गोरखपुरी ने’ ने सभी साहित्यकारों, श्रोताओं एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ क्षत्तीसगढ़ की जलेश्वरी वस्त्रकार द्वारा प्रस्तुत माँ सरस्वती की वंदना से हुआ। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति ने समस्त वातावरण को भक्तिमय एवं साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया। मंच की संस्थापिका संगीता श्रीवास्तव ने सभी रचनाकारों एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए साहित्य साधना काशी मंच की साहित्यिक यात्रा और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात काव्य-पाठ का क्रम प्रारम्भ हुआ। मीरा सक्सेना ने अपने गीत”सघन घन घिर-घिर आए,रेजिया में शोर मचाए रे”के माध्यम से सावन की मादकता और प्रकृति के मनोहारी सौन्दर्य का सजीव चित्र उपस्थित किया। सरोज विश्वकर्मा ने”मेरे नैना सावन भादो”गीत सुनाकर विरह और प्रेम की गहन संवेदनाओं को प्रभावशाली स्वर प्रदान किया।  खालिद हुसैन सिद्दीकी ने”जब मस्त-मस्त पुरवा डोले,जब बागों में पपीहा बोले,जब पड़े फुहारें रिमझिम,तब समझो सावन अँचरा खोले”जैसी मनोहारी रचना प्रस्तुत कर वर्षा ऋतु के सौन्दर्य को साकार कर दिया।  ममता श्रवण अग्रवाल ने”आई वर्षा की फुहार सखि,कहवा सुनाऊँ भोर-भोर बतिया”गीत के माध्यम से ग्रामीण जीवन,वर्षा और लोक-संवेदना का सुंदर चित्रण किया। प्रो. वत्सला श्रीवास्तव ने”बरखा ऋतु प्यारी है,बारिश की शोभा न्यारी है” शीर्षक रचना में प्रकृति के विविध मनोहारी रूपों का सहज एवं सरस वर्णन प्रस्तुत किया। डॉ.राम अवतार वर्मा ने अपनी भावपूर्ण रचना “आओगे कब मुरलीधर श्याम,मिला नहीं तेरा पैगाम”के माध्यम से कृष्ण-भक्ति एवं विरह की मार्मिक अनुभूति कराई।सतीश शिकारी ने संस्कृत में वर्षा-वर्णन पर आधारित गीत “पश्यन्तु वर्षा,नृत्यन्ति मेघायत घन…”का प्रभावशाली पाठ किया। उनकी प्रस्तुति ने संस्कृत साहित्य की मधुरता और गरिमा का सुंदर परिचय कराया। प्रेमलता रसबिन्दु ने सावन की भाव-तरंगों से ओतप्रोत अपना गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को ऋतु-रस में सराबोर कर दिया। अरुण कुमार श्रीवास्तव ने अपनी ग़ज़ल ” आत्मा तत्व का अद्वैत से संवाद होता है” का प्रभावपूर्ण पाठ किया,जिसमें आत्मचिंतन,आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय देखने को मिला। डॉ. हनुमान प्रसाद चौबे ने भी सावन विषयक गीत प्रस्तुत कर वर्षा ऋतु की उमंग,प्रेम और प्रकृति के मनोहारी स्वरूप को शब्दों में पिरोया। साधना साही ने.सावन में बरसेला बुनिया,तरसे सारी दुनिया, गीत पढकर सावनी रंग मे सबको सराबोर कर दिया। डा.अर्चना श्रेया ने.साजन तुम आ जाते झमझम बारिश में,गीत द्वारा एक विरहणी के मनोभाव को दर्शाया,अंत मे संगीता श्रीवास्तव ने”मेहनतकश बालाएँ, श्रृंगार दमकता चेहरा है”गीत प्रस्तुत किया। अंत में अध्यक्ष अरुण कुमार श्रीवास्तव द्वारा आभार ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

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