कवि-पत्रकार ओंकार सिंह के कविता संग्रह ‘ बीमार शब्दों का बहुमत ‘ का लोकार्पण

गोरखपुर। जन संस्कृति मंच की गोरखपुर इकाई द्वारा आज शाम गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में कवि-पत्रकार ओंकार सिंह के कविता संग्रह ‘ बीमार शब्दों का बहुमत ‘ का लोकार्पण हुआ। लोकार्पण के बाद संग्रह की कविताओं पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ आलोचक एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो अनिल राय ने कहा कि ओंकार सिंह को नए स्तर के अनुभवों वाले सतर्क और समृद्ध कवि हैं।
उन्होंने कहा कि कवि भले अपनी कविताओं को राजनीतिक-सामाजिक स्थिति पर सपाट बयानी माने लेकिन उनकी संग्रह की तमाम कविताओं में रूप विन्यास की सजगता और कौतुकी प्रवृत्ति है। उन्हें कलात्मक विवेक की जानकारी है। उन्होंने ’ डरना ’ शीर्षक कविता की विशेष रूप से चर्चा करते हुए कहा कि कवि ने इस कविता में डरना क्रिया की मनोसामाजिक निर्मिति को तीन चरणों में क्रांतिकारी रूपान्तरण किया है। उनकी यह कविता डर के रचनात्मक जद्दोजहद को न्याय, सत्य और अच्छे के साथ खड़ा कर देती है। उन्होंने ‘ बीमार शब्दों का बहुमत ’ कविता की चर्चा करते हुए कहा कि जैविक मनुष्य से सांस्कृतिक मनुष्य के रूपान्तरण की विकास यात्रा में सबसे बड़ी क्रांतिकारी भूमिका भाषा की रही है। आज नई बनती दुनिया में शब्दो का अवमूल्यन हुआ है। यह अवमूल्यन वर्चस्वी सत्ता की नीतियों, कार्यक्रमों और षडयंत्रों के जरिए हुआ है। एक तरह से शब्दों के अर्थ का अपहरण किया गया है। उन्होंने कहा कि यह कविता बड़ी चिंता को संबोधित है लेकिन अपने भीतर के अंतरर्विरोधों और शिल्प में कमजोर कविता है।
वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार ने कहा कि कविता होने की प्रमुख शर्तों में एक यह है कि कवि में अभिव्यक्ति की बेचैनी होनी चाहिए। बेचैनियाँ कविता बनाती हैं और वे पाठक को भी बेचैन करती है। कहा गया है कि बेचैनी लेखक की संपत्ति होती जिसे वह बदलाव के लिए इस्तेमाल करता है। ओंकार सिंह की कविताओं में एक अनगढ़ बेचैनी है जिसे उन्हें सुगढ़ बेचैनी में ढालना होगा। कह सकते हैं कि उनकी कविताएं अभी रास्ते में हैं लेकिन इस दौरान की उसकी मूल्यवान प्राप्तियां भी हैं।
वरिष्ठ कथाकार लालबहादुर ने कहा कि ओंकार सिंह की कविताएं प्रगतिशील समझ की कविताएँ हैं। उनमें समाज की गहरी समझ है। कविता एक तरह का राजनीतिक कर्म है। ओंकार की कविताएं यह काम बखूबी करती हैं।
आलोचक प्रोफेसर मधुप कुमार मुक्तिबोध ने कहा कि ओंकार सिंह की कविताएँ एक व्यक्ति कामरेड की कविताएं हैं। बतौर कवि उनकी बेचैनियां धीरे-धीरे स्थिर हो रही हैं। बेचैनियाँ आशावादी ऊर्जा का संचार करती हैं। कहीं-कहीं जब वह कविता में व्यक्तिगत होते भी हैं तो उनका कामरेड इंस्टिंक्ट काम करता है। उनकी कविताएं सामाजिकता के साधारणीकरण की चेष्टा है। यह चेष्टा उम्मीद बढ़ाने वाली है। उनकी कविताओं में थमी हुई बेचैनी पाठक को संत्रस्त करती हैं। आज समाज निरंतर संकुचति होता जा रहा है। समाज में शब्द ही नहीं धर्म तक को बीमार बना दिया गया है जिस पर कम बात होती है।
प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो सदानंद शाही ने कहा कि आज शब्दों की जिस तरह दुर्व्याख्या हो रही है वह अभूतपूर्व है। शब्दों को उसके मूल अर्थों से विस्थापित किया जा रहा है, उन्हें विरूपित किया जा रहा है। इसे ठीक करने की जिम्मेदारी कवि और कविता की है। बीमार शब्दों का बहुमत का कवि इसी बडी चिंता को स्वर दे रहा है। आज के समय में कवि पर सामाजिक नैतिकता, विधान और मनुष्यता को समाज में स्थपित करने का बड़ा भार आ पड़ा है। कवि को शब्दों के सहारे समाज को जागृत समाज में बदलने का काम करना होगा।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे युवा आलोचक डॉ रामनरेश राम ने कहा कि ओंकार सिंह इक्कीसवीं शदी की युवा कविता के ऐसे प्रतिनिधि कवि हैं जिनके पास शहर से लेकर गांव तक का आवयविक अनुभव हैं। उनके पास एक मुकम्मल दृष्टि है, वैकल्पिक समाज का सपना है। उसके लिए जमीनी संघर्ष का अद्यतन अनुभव है। यही उनकी असली थाती है। दरअसल उनकी कविता का तेवर इन्हीं अनुभवों से आकार पाता है। ओंकार सिंह की कविता मनुष्य के आदिम गुणों की सृजनशीलता को जब विषय बनाती है तब वह इन्कलाब की ओर जाती है। वह लिखते हैं- डरना बुरा नहीं है बस यह व्यक्तिगत डर न हो जब हम सिर्फ अपनों के लिए डरते हैं तब हम क्रूर हो सकते हैं लेकिन जब हम सबके लिए डरते हैं तब हम मोहब्बत हो सकते हैं इन्कलाब हो सकते हैं। उनकी कविताएँ क्रूरता और हिंसा का निषेध करके मोहब्बत और इंकलाब का सन्देश देती हैं।
कार्यक्रम में कवि ओंकार सिंह ने आधा दर्जन कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताओं पर वरिष्ठ रंगकर्मी राजाराम चौधरी और कवयित्री सरिता यादव ने चर्चा की और उन्हें बड़ी संभावनाओं वाला कवि बताया।
कविता संग्रह के लोकार्पण के बाद जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने ओंकार सिंह का परिचय देते हुए उनकी काव्य यात्रा के बारे में बताया। धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्रा रिंकी प्रजापति ने किया।
कार्यक्रम मेें शायर कलीमुल हक, सामाजिक कार्यकर्ता मनोज मिश्र, भाकपा माले के सचिव राकेश सिंह, युवा कवि केतन यादव, युवा कवयित्री सुनीता अबाबील, शिवांगी गोयल, रंगलेखक डाॅ आनंद पांडेय, लेखक स्वदेश, कवि वेदप्रकाश, सच्चिदानंद पांडेय, सुभाष पाल एडवोकेट, शिक्षक बेचन सिंह पटेल, फिल्मकार देशबंधु, चक्रपाणि ओझा सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।








