चार मोहर्रम का निकला मातमी जुलूस

पूर्वा टाइम्स – मो० अनस अन्सारी

गोरखपुर। चार मोहर्रम का मातमी जुलूस बसंतपुर स्थित स्वर्गीय मोहम्मद मेहंदी एडवोकेट के घर से दिन में 2 बजे बरामद हुआ, जबरदस्त गर्मी के बावजूद इस जुलूस में अंजुमन हुसैनिया के बच्चों ने, नौजवानों ने, बूढ़ों ने, हाथों से, और कमा (छुरियौ) से, चाकू से अपने सीने, माथे, और पीठ, पर मातम किया, और या हुसैन या हुसैन की सदा लगा रहे थे, इमाम हुसैन की याद में पूरा माहौल गमगीन हो गया था, एक तरफ जहां जबरदस्त धूप थी वहीं तेज आवाज में या हुसैन की सदा गूंज रही थी।

इमाम हुसैन अ.स. का बलिदान हमें सत्य, न्याय और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस जुलूस के माध्यम से हम उनके द्वारा दिखाए गए साहस और समर्पण को याद करते हैं और उनके संदेश को फैलाने का प्रयास करते हैं।

इमाम हुसैन ने इराक स्थित कर्बला मे बलिदान द्वारा स्पष्ट संदेश दिया कि जुल्म के खिलाफ हमेशा आवाज उठाना चाहिए और अगर आप हक पर हैं तो जालिम से डरना नहीं चाहिए, आज दुनिया में इसी संदेश के मार्गदर्शन पर लोग जुल्म के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी जीत सुनिश्चित कर रहे हैं, कर्बला के बलिदान से सीख लेकर कुछ देश ताकतवर देशों से जीत रहे हैं।

इमाम हुसैन की कुर्बानी नाइंसाफी को खत्म करने के लिए थी इसीलिए हर साल मोहर्रम में इस कुर्बानी की याद सिर्फ मुसलमान ही नहीं मनाते बल्कि हर वह इंसान मानता है जो इंसाफ पसंद है चाहे उसका संबंध किसी भी धर्म और मजहब से हो जब कभी हम दुनिया में आतंकवाद भ्रष्टाचार और जुल्म देखें और अपने आप को अकेला महसूस करें तो कर्बला के पैगाम को याद करें जो हमें याद दिलाता है कि अगर जुल्म के खिलाफ मुकाबले में अकेले हो या तादाद में कम हो तो थक कर घर में ना बैठ जाना सच्चाई की राह पर अगर कदम आगे बढाओगे तो याद रखो की जीत हमेशा सच्चाई की ही होगी फिर चाहे उस सच्चाई के लिए तुम्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े।
इतिहास गवाह है कि ज़ालिम यजीद सारे जुल्म करने के बाद भी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका और हार गया लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जान देकर भी जीत गए क्योंकि वह जुल्म के आगे नहीं झुके और इंसानियत को बचा लिया इस्लाम अमन का मजहब है जो यह सिखाता है कि इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है अगर आप एक अच्छे इंसान नहीं तो आप एक अच्छे मुसलमान भी नहीं बन सकते।

यह जुलूस हल्सीगंज, घंटाघर, रेती, होते हुए निकट गीता प्रेस इमामबाड़ा रानी अशरफुन निशा खानम पर समाप्त हुआ। जुलूस में भारी संख्या में प्रत्येक धर्म और मजहब के लोगों ने शिरकत किया। जुलूस में जनाब सिब्ते रिजवी जनाब मिर्जा अली, जनाब मिर्जा हुसैन, जनाब मिर्जा मेहंदी हसन (आमिश), सोनू, ताहिर, तालिब, जीशान, सैफी, गुड्डू, शबाब, तैयब, हसनैन, शम्स, आशु, अली अब्बास, जावेद निसार, सनी, लकी, विकी, मिर्जा इफ्तिखार, आगा हसन मोहम्मद, आगा शानदार हुसैन, मास्टर वज़ीह, मास्टर असफर हुसैन आदि लोग उपस्थित रहे।

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