समय को भांपना सीखो, समय का क्या भरोसा है
अभिव्यक्ति सांस्कृतिक मंच की काव्य गोष्ठी में हुआ रचना पाठ
पूर्वा टाइम्स – डॉ अनिल गौतम

गोरखपुर। नूतन संवत्सर एवं चैत्र रामनवमी के उपलक्ष्य में आयोजित अभिव्यक्ति की काव्यगोष्ठी आशातीत रूप से और भी अधिक सफल रही। प्रचण्ड गर्मी के बावजूद स्थानीय से लेकर 40 किलोमीटर की दूरी तक के प्रतिभागी रचनाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति द्वारा गोरखपुर की साहित्यिक उर्वरता को प्रमाणित किया।वरिष्ठ शायर सिद्दीक़ मजाज़ की अध्यक्षता एवं शशिविन्दु नारायण मिश्र के संचालन में आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता संस्थाध्यक्ष डा. जय प्रकाश नायक ने अपने चिलमापुर स्थित आवास पर किया। गोष्ठी की शुरुआत विनय पाठक ने शानदार आग़ाज़ किया आदमी ख़ुद ही मदारी है, ख़ुद तमाशा भी। नेहा मिश्रा के दहेजरोधी गीत ने सोचने को विवश किया – दे दिया सर्वस्व अपना, कितना बेबस बाप होगा? सत्यशील राम त्रिपाठी ने नये जनवादी तेवर उभारे- महकना चाहते हैं पर महक नहीं पाते।नित्या त्रिपाठी ने तंज किया -नहीं दफ़्तर है ये, कोल्हू है समझो,यहाँ इंसान जोता जा रहा है।विनोद निर्भय ने फ़रमाया अकेला कल मुझे मझधार में तुम छोड़ आए थे।डा. सरिता सिंह ने सबके हृदय को छुआ –
घर से बाज़ार पैदल ही जाती थी माँ,इस तरह चार पैसे बचाती थी माँ।वसीम मज़हर गोरखपुरी ने लाजवाब शे’र पढ़े – बीवी की ख़ातिर लेदर की जैकेट तो ले आए हो।सुनैना गुप्ता ने सरस उपस्थिति दी – कई ख़्वाब दिल में छुपा के चलेंगे।डा. बहार गोरखपुरी ने सामाजिक चिंतन को आयाम दिया – सारे रिश्ते गणित हो गए,रूठना और मनाना गया। डा. कनकलता मिश्रा ने समां बाँधा -ज़िन्दगानी मेरी तेरे नाम हो जाए।डा. चेतना पाण्डेय ने चिरपरिचित ऊँचाई दी हम वो कुंभन हैं जिसे सिर्फ़ श्याम से निस्बत। सृजन गोरखपुरी ने अश्आर के नश्तर चलाए – सोने की थाली में खाने वाला ही,भूख लिखेगा बेहतर डा.जय प्रकाश नायक ने ग़ज़ल को नया आयाम दिया – यहाँ के लोग अजब बेहिसी में जीते हैं, दिलो-दिमाग पर कोई असर नहीं होता।उस्ताद शायर सरवत जमाल ने मानक शे’र पढ़े –
मिनट, घण्टे, सेकण्ड इनका कोई मतलब नहीं होता,समय को भाँपना सीखो, घड़ी का क्या भरोसा है? अध्यक्षता कर रहे सिद्दीक़ मजाज़ ने काव्यक्रम को अंतिम आयाम दिया – न जादू और न टोना चाहिए था,उसे दिल में समोना चाहिए था।आभार ज्ञापन संस्थाध्यक्ष डा. जय प्रकाश नायक ने किया।








