व्यक्ति के जीवन में अंत और आरंभ का गहरा नाता है-आचार्य अनिल शास्त्री

पूर्वा टाइम्स -बेचन शर्मा
सहजनवा गोरखपुर। सहजनवा तहसील अंतर्गत विकास खंड पाली क्षेत्र स्थित के नगर पंचायत घघसरा वार्ड संख्या 14 हनुमंत नगर के मुख्य बाजार में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा व्यास पीठ से तीसरे दिन श्रद्धालुओ को रसापान कर रहे थे।
व्यक्ति के जीवन में अंत और आरंभ का बहुत गहरा नाता है। यूँ कहें कि दोनों साथ- साथ चलते हैं। शास्त्रों में वर्णन आता है कि- भारत जी को हिरण के बच्चे से बहुत प्रेम हो गया और वह जीवन के अंतिम समय में केवल उसी को याद करते हुए शरीर का त्याग किय। परिणाम यह हुआ कि- अगला जन्म उनका हिरण शरीर में ही हुआ। उक्त- बातें अयोध्या धाम से पधारे आचार्य अनिल शास्त्री ने कही । वह घघसरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या 14 हनुमंत नगर के मुख्य बाजार में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा व्यास पीठ से तीसरे दिन श्रद्धालुओं को कथा रसपान कर रहे थे। कथा विस्तार करते हुए उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती सम्राट भारत जी महाराज वानप्रस्थ जीवन में कठोर तपस्या कर रहे थे। एक घटना ने उनके जीवन की दिशा को दशा को बदल कर रख दिया।
कथा व्यास ने कहा कि- घटना ऐसी घटी कि एक दिन शेर के भय से जान बचाकर भागती हुई हिरणी का नदी के प्रवाह में प्रसव हो गया । पानी में डूबते हुए बच्चों को भारत जी ने बचा लिया। कुटी पर लाये और बहुत प्यार से पालन-पोषण किया। वयस्क होने पर वही हिरण का बच्चा उन्हें छोड़कर हिरणों के झुंड में चला गया। महात्मा भारत उसके वियोग को सहन नहीं कर पाए और अपने प्राण त्याग दिये। परिणाम यह हुआ कि अगला जन्म उनका हिरण के रूप में हुआ। गनीमत यह रही कि पूर्व जन्म में किए सत्कर्म, भगवान का भजन-कीर्तन उन्हें बचा लिया और वह शरीर का त्याग कर भगवान के धाम चले गए। उक्त- अवस पर- यजमान रामजी अग्रहरि एवं उनकी पत्नी विमलावती देवी,
हनुमान, ज्ञानचंद, संतोष, सत्येन्द्र, संदीप, ध्रुव अग्रहरि,
सुनील कशौधन, सूरज, आकाश, लडडू समेत भारी संख्या में लोग मौजूद थे।








